इस लेख में जानिए
- बर्मामाइंस में धूल प्रदूषण स्थानीय लोगों के दैनिक जीवन और स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित कर रहा था।
- समुदाय की भागीदारी और स्थानीय वायु गुणवत्ता निगरानी ने इस मुद्दे को कैसे अधिक स्पष्ट बनाया।
- क्यों स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए केवल नियम नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी भी ज़रूरी है।
झारखंड का औद्योगिक शहर जमशेदपुर लंबे समय से उद्योगों, भारी वाहनों, निर्माण कार्यों और सड़क की धूल के कारण वायु प्रदूषण की चुनौती का सामना करता रहा है। बर्मामाइंस, जुगसलाई, मानगो और गोलमुरी जैसे क्षेत्रों में रहने वाले लोग वर्षों से धूल और खराब वायु गुणवत्ता की शिकायत करते रहे हैं। इन्हीं क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को लेकर समुदाय के बीच जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से आदर्श सेवा सदन और उसके युवा स्वयंसेवी नेटवर्क वायुवीर (Vayuveer) ने लगातार काम किया। समुदाय के साथ संवाद, वायु गुणवत्ता की निगरानी और स्थानीय समस्याओं को सामने लाने के प्रयासों ने लोगों को अपने पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग बनाया।
बर्मामाइंस स्थित एक बैचिंग प्लांट लंबे समय से स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बना हुआ था। स्थानीय निवासियों के अनुसार यहां सीमेंट, गिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री मिलाकर तैयार मिश्रण विभिन्न निर्माण कार्यों में भेजा जाता था। इस प्रक्रिया के दौरान उड़ने वाली धूल आसपास की बस्ती, दुकानों और सड़कों तक पहुंच जाती थी। लोगों का कहना था कि कई बार घरों की खिड़कियां और दरवाजे बंद रखने पड़ते थे तथा हवा में महीन धूल लंबे समय तक बनी रहती थी।
असर और वायुवीर की टीम ने समुदाय के साथ बैठकों के दौरान लोगों से उनके अनुभव दर्ज किए और पोर्टेबल एयर क्वालिटी मॉनिटर (AQ Monitor) के माध्यम से स्थानीय स्तर पर वायु गुणवत्ता की निगरानी भी की। स्थानीय लोगों के अनुसार प्लांट के आसपास धूल का स्तर काफी अधिक महसूस होता था। यह डेटा और समुदाय की शिकायतें लोगों में इस मुद्दे के प्रति जागरूकता बढ़ाने का माध्यम बनीं।

बर्मामाइंस के ऑटो चालक रमेश बताते हैं कि पहले प्लांट के सामने से गुजरना भी मुश्किल हो जाता था। उनके अनुसार हवा में सीमेंट की धूल इतनी अधिक रहती थी कि सांस लेने में परेशानी होती थी और इसका असर आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता था। वहीं कई स्थानीय दुकानदारों ने बताया कि उनकी दुकानों पर दिन में कई बार धूल जम जाती थी। विशेष रूप से खाद्य सामग्री बेचने वालों को ग्राहकों की शिकायतों का सामना करना पड़ता था और कारोबार भी प्रभावित होता था।
इस प्रदूषण का असर बच्चों पर भी दिखाई देता था। रणवीर (16 वर्ष), जो खालसा उच्च विद्यालय का छात्र है, ने बताया कि स्कूल आते-जाते समय उसे प्लांट के पास से गुजरना पड़ता था, जहां धूल की मात्रा काफी अधिक रहती थी। उसके अनुसार कई बार खांसी, सांस लेने में परेशानी और तबीयत खराब होने के कारण पढ़ाई भी प्रभावित होती थी। अभिभावकों ने भी बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की।
इस दौरान असर और वायुवीर ने समुदाय के साथ नियमित संवाद, स्थानीय बैठकों और वायु प्रदूषण के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को यह समझाने का प्रयास किया कि स्वच्छ हवा उनका अधिकार है और प्रदूषण संबंधी समस्याओं को प्रशासन तथा संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाना आवश्यक है। इन प्रयासों से स्थानीय लोगों में अपने अनुभव साझा करने और पर्यावरणीय मुद्दों पर आवाज उठाने का विश्वास बढ़ा।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार जनवरी 2025 में जिला प्रशासन और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने शहर के विभिन्न औद्योगिक प्रतिष्ठानों का संयुक्त निरीक्षण किया। मार्च 2025 में प्रस्तुत रिपोर्ट में बर्मामाइंस स्थित बैचिंग प्लांट को स्थानीय धूल प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल करते हुए इसे आबादी वाले क्षेत्र से बाहर स्थानांतरित करने की अनुशंसा की गई। बाद में यह प्लांट बंद हो गया अथवा दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने क्षेत्र की वायु गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार महसूस किया।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्लांट बंद होने के बाद हवा में उड़ने वाली धूल काफी कम हो गई है। दुकानदारों को बार-बार सफाई करने की आवश्यकता पहले की तुलना में कम पड़ती है और राहगीरों को भी राहत महसूस हो रही है। हालांकि प्लांट के बंद होने का आधिकारिक कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह अनुभव दिखाता है कि समुदाय की सक्रिय भागीदारी, पर्यावरणीय निगरानी, संस्थागत जांच और वायु प्रदूषण के प्रति बढ़ी जागरूकता मिलकर सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
बर्मामाइंस का यह अनुभव दिखाता है कि वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए केवल नियम और संस्थागत कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं होती। समुदाय की भागीदारी, स्थानीय अनुभवों का दस्तावेजीकरण और नियमित पर्यावरणीय निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी सोच के साथ असर और उसके युवा स्वयंसेवी नेटवर्क वायुवीर ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर संवाद, जागरूकता और वायु गुणवत्ता की निगरानी जैसे प्रयास किए, ताकि समुदाय अपनी चिंताओं को बेहतर ढंग से सामने रख सके। यह अनुभव बताता है कि जब समुदाय, संस्थाएं और प्रशासन मिलकर काम करते हैं, तो स्वच्छ हवा और स्वस्थ वातावरण की दिशा में सार्थक बदलाव की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
जमशेदपुर के रिंकू पाल (23) ‘वायुवीर’ हैं। वह ग्रैजुएट हैं। अन्य वायुवीरों के साथ मिलकर चौपाल और अन्य कार्यक्रमों से समुदाय में वायु प्रदूषण पर जागरूकता अभियान चलाते हैं। वे AI और नवीन तकनीक के माध्यम से पर्यावरण और वायु प्रदूषण पर प्रयास कर रहे हैं और लगातार नए युवाओं को वायुवीर नेटवर्क से जोड़ रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए JSW-TOI अवॉर्ड्स 2026 में ‘यंग क्लाइमेट चैंपियन’ सम्मान वायुवीरों को मिला जिसका वह एक हिस्सा रहे हैं।